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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

जन गण मन की कहानी ..............................



Bang against the British - break up the movement against the people of Bengal
The British moved their capital from Calcutta to Delhi to save you
Carried and declared the capital to Delhi in 1911. At that time people all over India
Was full of rebellion, the king of England invited to India by the British
So people should relax. England's King George V in 1911 in India
It. Rabindranath Tagore was to put pressure on you a song of George V
Will be welcome to write.

The Tagore family was very close to the British, their family
Many people worked for the East India Company, his older brother
East India Company in Calcutta until Tagore avaneendra long division
Director (Director) was. East India Company was in a lot of money to their family
हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए।
रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन
अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी
राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त
में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता
अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक
(Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो !
तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र,
द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया
जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर
ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा
गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो
इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि
जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये
गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह
बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने
नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम
के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए।
जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो
रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि
गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब
डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने
एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो
और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि
नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन
1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ
और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी
तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम
अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर
गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक
तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद
खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो
अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के
खिलाफ होने लगे थे।

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS
ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है)
। इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव
डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं
गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी
को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी
मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की
मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और
सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे
एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे।
मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की
सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि
गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को
धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने
गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया
करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि
गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी
तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश
के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।
उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से
समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले
गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम
दल वाले "वन्दे मातरम"।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो
अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को
वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप
जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन
गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू
कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन
से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और
मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र
हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली।
संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित
वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित
जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट
पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं
अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे
पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी
नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत
तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया
"विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी
तैयार नहीं हुए।

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन
ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को
गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को
राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके
जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न
हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया।
नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट
पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान
बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस
लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और
वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते
थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों
ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के
सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों
को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक
जज्बा पैदा होता है।

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि
आपको क्या गाना है ?

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा
लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस
भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर।

चलिए चला गया 2011


चलिए चला गया 2011
ले गया अपने साथ -
देव - शम्मी - नवाब पटौदी
भीमसेन जोशी, जगजीत सिंह और
मकबूल फ़िदा हुसैन साहब को,
दे गया राहत दुनिया को -
ओसामा और गद्दाफी से.....
साथ में दे गया सिर दर्दियाँ -
तमाम घोटालों और महंगाई की
लुढ़कते सेंसेक्स और रुपये की,
भ्रष्टाचार और लोकपाल पर
राजनीति और कूटनीति की....
लीजिये आ रहा है 2012
कामना है कि लाये अपने साथ -
कुछ ख़ास उपलब्धियां
कुछ ख़ास खुशहालियां,
दे जाए कुछ राहत -
बढती महंगाई से - भ्रष्टाचार से
बढ़ते अपराधों और घोटालों से,
कर जाए पूरी तरह से सफाया -
आतंकवादियों - नक्सलवादियों का
भुखमरी और बेरोज़गारी का....
और दे जाए कुछ सदबुद्धि -
हमारे राजनेताओं को कि
अपने बारे में ही नहीं
कुछ देश के बारे में भी सोचें,
हमारे युवाओं को कि
पति - पत्नी - प्रेमिका के अलावा
माँ - बाप के बारे में भी सोचें....
फेसबुक के साथ - साथ
लाइफ बुक के बारे में भी कुछ सोचें...
बाहरी तकनीक की नक़ल के साथ-साथ
अपनी अक्ल लगाने पर भी कुछ सोचें...
पिज्जा - बर्गर - कोक निगलते हुए
कम उम्र में ही बढ़ते मोटापे और
बिगड़ते स्वास्थ्य पर भी कुछ सोचें...
टीवी पर बेमतलब मनोरंजन के साथ - साथ
सार्थक कार्यक्रमों पर भी कुछ सोचें.....
बहुत हो गया..........चलिए अब हम
आप सभी को नए साल के लिए
हार्दिक शुभकामना भी तो दे दें.........
" नया साल हम सभी के लिए
विशेष सुख - शांतिमय, हर्ष - आनंदमय,
सफलता - उन्नति - यश - कीर्तिमय और
विशेष स्नेह - प्रेम एवं सहयोगमय हो !!!!

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

PANI


PANI





1 - Pani Upar Uthe Toh Bhanp

Upar Se Gire Toh Baarish





2 - Jam Ke Gire Toh Oola

Gir Ke Jame Toh Barf



3 - Patte Par Gire Toh Shabnam

Patte Se Gire Toh Arq



4 - Aankh Se Nikle Toh Aansoo

Bahe Toh Darya

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

क्या पता कल हो ना हो




आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

~!~!Technical Poem~!~!~

Jo sadiyaon se hota aaya hai Woh repeat kar

doonga... Tu naa mili to tujhko dil sey

Ctrl+Alt+delete kar doonga... Company kee

ladkiyaan sunder hain Aur lonely hain... Problem

ye hai ki bus voh READ-ONLY hain... Shayad mere

pyar ko taste karna bhool gaye... Dil sey aisa CUT

kiya ke PASTE karna bhool gaye... Tumhare samne

hain itney items kabhi hame bhi pick karo...

Hamare pyar ke ICON pe kabhi to tum

DOUBLE-CLICK karo... Roz subha hum karte hai

itne pyar se unhe good morning... woh humhe

ghoor kar dekhte hain jaise 0 ERRORS but 5

WARNINGS... Ho gayi galti humse, click ho gaya

mouse Duniya ki parwaah chhodo, ban jaao meri

spouse! Tumse mila main kal to, mere dil mein hua

ek sound, Lekin aaj tum mili to kehti ho: Your file

not found! Ab aur kaho na tum, "but" ya "if" Tum

ho meri zindagi ki animated .gif Aysa bhi nahin hai

ke, I don't like your face Par dil ke computer mein,

nahin hai enough disk space Ghar se nikalti ho

tum jab, pehen ke evening gown Too many

requests se, ho jaata hai server down Tumhaare

liye pyaar ki application, create main karoonga

Tum usay debug karna, wait main karoonga

Tumhaara intezaar karte karte, main so gaya Yeh

dekho mera connection, time out ho gaya Kya

chaal hai tumhaari, jaise chalti hai koi cat What is

your ICQ number, aao karein chat Tum jabse meri

zindagi mein, aayi ho banke female Yaad raha na

ab kuch, na postman, na e-Mail...

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

!!!...यमराज का इस्तीफा...!!!


एक दिन यमदेव ने दे दिया अपना इस्तीफा।
मच गया हाहाकार, बिगड़ गया सब संतुलन,
करने के लिए स्थिति का आकलन,
इन्द्र देव ने देवताओं की आपात सभा बुलाई
और फिर यमराज को कॉल लगाई।

'डायल किया गया नंबर कृपया जाँच लें'
कि आवाज तब सुनाई।

नये-नये ऑफ़र देखकर नम्बर बदलने की
यमराज की इस आदत पर इन्द्रदेव को खुन्दक आई,

पर मामले की नाजुकता को देखकर,
मन की बात उन्होने मन में ही दबाई।
किसी तरह यमराज का नया नंबर मिला,
फिर से फोन लगाया गया तो
'तुझसे है मेरा नाता पुराना कोई'
का मोबाईल ने कॉलर टयून सुनाया।

सुन-सुन कर ये सब बोर हो गये
ऐसा लगा शायद यमराज जी सो गये।

तहकीकात करने पर पता लगा,
यमदेव पृथ्वीलोक में रोमिंग पे हैं,
शायद इसलिए, नहीं दे रहे हैं
हमारी कॉल पे ध्यान, क्योंकि बिल भरने
में निकल जाती है उनकी भी जान।

अन्त में किसी तरह यमराज
हुये इन्द्र के दरबार में पेश,
इन्द्रदेव ने तब पूछा-यम
क्या है ये इस्तीफे का केस?
यमराज जी तब मुँह खोले
और बोले-

हे इंद्रदेव।
'मल्टीप्लैक्स' में जब भी जाता हूँ,
'भैंसे' की पार्किंग न होने की वजह से
बिन फिल्म देखे, ही लौट के आता हूँ।
'बरिस्ता' और 'मैकडोन्लड'
वाले तो देखते ही देखते इज्जत उतार
देते हैं और सबके सामने ही
ढ़ाबे में जाकर खाने-की सलाह दे देते हैं।

मौत के अपने काम पर जब
पृथ्वीलोक जाता हूँ
'भैंसे' पर मुझे देखकर पृथ्वीवासी
भी हँसते हैं | और कार न होने के ताने कसते हैं।
भैंसे पर बै�� े-बै�� े झटके बड़े रहे हैं
वायुमार्ग में भी अब ट्रैफिक बढ़ रहे हैं।
रफ्तार की इस दुनिया का मैं भैंसे से
कैसे करूँगा पीछा। आप कुछ समझ रहे हो
या कुछ और दूँ शिक्षा।

और तो और,

देखो रम्भा के पास है 'टोयटा'
और उर्वशी को है आपने 'एसेन्ट' दिया,
फिर मेरे साथ ये अन्याय क्यों किया?



हे इन्द्रदेव।
मेरे इस दु:ख को समझो और
चार पहिए की जगह चार पैरों वाला
दिया है कह कर अब मुझे न
बहलाओ, और जल्दी से
'मर्सिडीज़' मुझे दिलाओ।
वरना मेरा इस्तीफा अपने साथ
ही लेकर जाओ। और मौत का ये काम
अब किसी और से करवाओ।

रविवार, 4 जुलाई 2010

हिंदू कौन?


पश्चिमी देशों में भूख मिटाने, नींद लाने, यहां तक कि खुशी महसूस करने के लिए भी दवा का प्रयोग किया जाता है, जबकि भारत में मानसिक और ज्यादातर शारीरिक रोगों का समाधान ध्यान और योग में तलाशने की परंपरा है। हिंदू धर्म में ईश्वर को पाने का एक मार्ग ध्यान और योग भी बताया गया है। इसलिए यह मात्र धर्म ही नहीं है, बल्कि जीने की कला है। केवल किसी विशेष समुदाय में जन्म लेने वाला व्यक्ति ही हिंदू नहीं है, बल्कि जो इसकी मान्यताओं को अपने जीवन में उतारता है, वह भी हिंदू होता है। हजारों वर्ष पूर्व, ऐसे जनसमूह, जो किसी खास मत (सनातन धर्म) को मानते थे, उन्हें ईरानी लोगों ने नाम दिया हिंदू। सनातन धर्म का अर्थ होता है-जीवन जीने की शाश्वत शैली।
दुनिया की सबसे पुरानी आध्यात्मिक और नैतिक परंपरा ही हिंदुत्व है। इसके अनुसार, ईश्वर सर्वत्र मौजूद होते हैं। ईशोपनिषदके पहले मंत्र के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वरीय शक्ति विराजमान है। ऐसी सभी चीजें, जो दृश्य और अदृश्य हैं, जिनका हम स्पर्श कर पाते हैं या नहीं कर पाते हैं या फिर हर अच्छी और बुरी चीज भी सर्वशक्तिमान का ही अंश है। ईश्वर हमारे अंदर भी मौजूद हैं, जरूरत है तो इसे अनुभव करने की।
हिंदुत्व हमें बताता है कि किसी भी व्यक्ति की प्रकृति या स्वभाव बुरा नहीं होता है। यदि वह स्वयं को नहीं समझ पाता है या उसके शरीर और मन-मस्तिष्क में सही तालमेल नहीं हो पाता है, तभी वह बुरे कर्म करता है। स्वयं को नहीं समझ पाने के कारण व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह आदि का शिकार होता है।
हिंदू मूर्ति की पूजा नहीं, बल्कि आदर्श की पूजा करते हैं। हालांकि हिंदू मानते हैं कि ईश्वर सभी जगह मौजूद हैं, इसलिए उनके आदर्श को मूर्ति (प्रतीकात्मक स्वरूप) में पूजतेहैं।
उत्सव की परंपरा का दूसरा नाम हिंदू है। ईश्वर अनंत हैं। इसलिए उन्हें धन्यवाद देने और उनकी कृपा को याद करने के अपरिमित कारण हैं। इसलिए हम बुराई पर अच्छाई की विजय (दशहरा), नेकी की जीत और अंधकार में भी ईश्वर की उपस्थिति का उत्सव (दीपावली) मनाते हैं। इसे हम केवल पर्व या त्योहार का नाम नहीं दे सकते। दरअसल, ये मौसम और जीवन चक्र में बदलाव के भी सूचक होते हैं। सबसे बडी बात यह है कि ये उत्सव हमें आज के समय में जीने की कला सिखाते हैं। हमारी प्रार्थनाएं, भजन, मंत्रोच्चारण सभी ईश्वर की महिमा और आशीर्वाद के साक्षी हैं, लेकिन इसका गहरा प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पडता है। इसलिए यह धर्म किसी जाति, राष्ट्र आदि की सीमा में नहीं बंधा है।

मंगलवार, 22 जून 2010

गंगा की महिमा

गंगा अन्य नदियों की भांति एक भौगोलिक नदी मात्र नहीं है, वह सुरसरिहै, भागीरथ के प्रयत्न की सफल अमृतधाराहै। वह सतत् प्रवाहिनीऔर सदानीरातो है ही और इन सबसे बढकर वह हर पीढी की, हर एक की मां भी है। इसीलिए गंगा पवित्र हैं, पतितपावनीहैं और पूज्य हैं। गंगा भारतीय संस्कृति का गौरव ही नहीं आधार भी है, वह नदी-घाटी सभ्यता की जननी ही नहीं, अपितु सभ्य समाज की पोषक भी है। वह भौतिक समृद्धि का प्राकृतिक संसाधन होने के साथ ही साथ आध्यात्मिक उन्नति का भी साधन है। गंगा के पावन तट केवल श्रद्धालुओं की आस्थामयीडुबकियों से ही नहीं जीवंत रहे हैं, वे विभिन्न प्रकार के साधकों की साधना स्थली भी बने हैं। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-राम भक्ति जहंसुरसरिधारा, सरसइब्रह्म बिचारप्रचारा।

पर्वत राज हिमालय के अंत:स्थलसे निकली यह पुण्यसलिलाभारत के अनेक प्रांतों को संजीवनी प्रदान करती हुई बंगाल की खाडी में अंतर्लीन हो जाती है। देवनदी अपनी इस सुदीर्घ यात्रा में हरिद्वार, प्रयाग, काशी आदि अनेक नगरों को तीर्थ बनाकर एक नई सामाजिक एवं पर्यटनीयसंस्कृति का सुसंगमनकराती है। गंगा की तरलताऊर्जादायीहै, निर्मलता शांतिदायी और अविरलतावरदायीहै। जिसे भी गंग-तीर्थ का पावन प्रवास प्राप्त हुआ उसका जीवन पुण्यमयहो गया। जिसने भी गंगा को मां मान सेवा की वह पवित्रमनहो मोक्ष को प्राप्त हुआ और जिसने भी गंगा को दरश परस मज्जन अरुपाना के माध्यम से अपनी श्रद्धा निवेदित की उसे परमतुष्टिका नैसर्गिक आनंद मिला। यद्यपि आज गंगा बहुत मैली हो चुकी है फिर भी न तो श्रद्धालुओं की श्रद्धा घटी है और न ही गंगा तीर्थो पर जुटने वाली भीड ही। हां, इतना परिवर्तन अवश्य हुआ है कि गंगा की मलिनता को लेकर जनजाग्रतिबढी है, लोगों का प्रदूषण फैलाने वालों के प्रति आक्रोश बढा है। आज सभी चाहते हैं कि गंगा पूर्व की भांति सदानीराहो, इसके लिए वे नाना प्रकार के संकल्पों, यात्राओं, परियोजनाओं आदि के माध्यम से जनता को जागरूक बनाने के साथ ही साथ सरकार से भी गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

जीवन की यात्रा

जब कभी हमें लंबा सफर करना पडता है, तब हम पहले ही सोच लेते हैं कि पहले, दूसरे और तीसरे दिन कितनी-कितनी दूर जाएंगे। अपने कुल सफर को हम कई मंजिलों में बांट देते हैं। जब एक मंजिल तय कर लेते हैं, तब दूसरे की तैयारी करते हैं। अगर एक मंजिल न जाएं, तो दूसरे की तैयारी की फिक्र नहीं रहती।

इसी प्रकार जीवन भी एक तैयारी है। रात को हम सोते हैं, तो इसलिए कि आराम करने से हम दूसरे रोज की मेहनत के लिए तैयार हो जाएं। नींद लेना केवल आराम करने के लिए है। परमेश्वर ने मनुष्य को ऐसा बनाया है कि उसके जीवन का एक भाग दूसरे भाग की तैयारी कर रहा होता है। जीने की सीख गोद के बच्चों को हाथ पकडकर खडा होना सिखलाया जाता है। धीरे-धीरे वह चलने लगता है। इसके बाद वह अपने आप खडा होने, चलने और दौडने लगता है। दो-तीन वर्ष के बच्चे अपने आप हाथ-पैर मारने लगते हैं, वे एक जगह स्थिर नहीं बैठ सकते हैं। उनका ऐसा स्वभाव भगवान ने उनके शरीर में बल बढाने के लिए बनाया है। यही बल आगे उनके काम आता है। छोटे बच्चों का स्वाभाविक खेल-कूद भी उन्हें जवानी के लिए तैयार करता है। उनके बोलने और सुनने की शक्ति उनमें आपसी सहानुभूति और प्रेम बढाती है। जब बच्चे बडे होते हैं, तो उन्हें स्कूल या पाठशाला भेजा जाता है। उन्हें अक्षर सिखाए जाते हैं, किताबें दी जाती हैं। उनसे कहा जाता है कि ठीक वक्त पर स्कूल जाना चाहिए। स्कूल में अलग-अलग प्रांतों के बच्चे पढते हैं। इनमें बंगाली, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय और पंजाबी बच्चे भी होते हैं, इनमें दोस्ती हो जाती है। उनमें से अधिकांश जीवनपर्यतमित्र बन जाते हैं।

शारीरिक व्यायाम के लिए प्रबंध रहता है, क्रिकेट, फुटबाल, हॉकीइत्यादि खेल होते हैं। नियमानुसार एक की हार होती है, दूसरे की जीत। प्रश्न उठता है कि पढाई और खेल क्यों होते हैं? जवाब है, क्योंकि ये आगे चलकर जीवन में काम आ सकें। जो लडके पढे-लिखेंगे, वे बडे होकर अपने कुटुंब का पालन कर सकेंगे, अपने देश की सेवा करने के योग्य बनेंगे। समय का महत्व खेल का महत्व इसलिए है, क्योंकि क‌र्त्तव्य पालन में कभी-कभी कुछ लोग उनके शत्रु बन सकते हैं। हारने पर दूसरे दल वालों से द्वेष व ईष्र्या और जीतने पर अभिमान और अहंकार न होने की उनसे उम्मीद की जाएगी। जो बच्चे सदैव समय पर पाठशाला जाएंगे, पाठशाला के नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगे, खेल के मैदान में न्याय से जीतने की चेष्टा करेंगे, वे बडे होकर संसार में संयमी बने रहेंगे। इस प्रकार पाठशाला के बालक आगे के लिए तैयार हो रहे हैं।

जब लोग जवान होते हैं, तब कमाने लगते हैं। सब लोग जानते हैं कि एक दिन वे बूढे हो जाएंगे, शरीर परिश्रम के योग्य नहीं होगा। इसलिए सबको इस बात की चिंता रहती है कि बुढापे के लिए कुछ कमाकर रख लें। जवानी बुढापे की तैयारी है। परमात्मा ने मनुष्य को जितना जीवन प्रदान किया है, उतना ही उसे चलाने के लिए आंख, नाक, कान जैसी ज्ञानेंद्रियोंका साजो-सामान भी दिया है। यदि सामान कम हो जाए, तो हमारी ही असावधानी है, उसका दोष नहीं। यदि बुढापे में हम उठ-बैठ न सकें, किसी को देख न सकें या बात न सुन सकें , तो निश्चित रूप से हमारे जवानी के दिन निष्प्रयोजन बीत गए। इस प्रकार बचपन लडकपन की तैयारी है। लडकपन जवानी की, जवानी बुढापे की और बुढापा एक ऐसे जीवन की तैयारी है, जिसे हम नहीं जानते। पर एक बात तो तय है कि हमारी आने वाली पीढियां उसी रास्ते पर चलेंगी, जिस पर हम चलते आए हैं।

जीवन संसार यात्रा की तैयारी है। यदि इसके महत्व को हम समझ जाएं, तो हममें आत्म-मर्यादा, परिश्रम, संतोष और आशा उत्पन्न हो जाए। हमारा जीवन संसार के उपकार का कारण बने।