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रविवार, 4 जुलाई 2010

हिंदू कौन?


पश्चिमी देशों में भूख मिटाने, नींद लाने, यहां तक कि खुशी महसूस करने के लिए भी दवा का प्रयोग किया जाता है, जबकि भारत में मानसिक और ज्यादातर शारीरिक रोगों का समाधान ध्यान और योग में तलाशने की परंपरा है। हिंदू धर्म में ईश्वर को पाने का एक मार्ग ध्यान और योग भी बताया गया है। इसलिए यह मात्र धर्म ही नहीं है, बल्कि जीने की कला है। केवल किसी विशेष समुदाय में जन्म लेने वाला व्यक्ति ही हिंदू नहीं है, बल्कि जो इसकी मान्यताओं को अपने जीवन में उतारता है, वह भी हिंदू होता है। हजारों वर्ष पूर्व, ऐसे जनसमूह, जो किसी खास मत (सनातन धर्म) को मानते थे, उन्हें ईरानी लोगों ने नाम दिया हिंदू। सनातन धर्म का अर्थ होता है-जीवन जीने की शाश्वत शैली।
दुनिया की सबसे पुरानी आध्यात्मिक और नैतिक परंपरा ही हिंदुत्व है। इसके अनुसार, ईश्वर सर्वत्र मौजूद होते हैं। ईशोपनिषदके पहले मंत्र के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वरीय शक्ति विराजमान है। ऐसी सभी चीजें, जो दृश्य और अदृश्य हैं, जिनका हम स्पर्श कर पाते हैं या नहीं कर पाते हैं या फिर हर अच्छी और बुरी चीज भी सर्वशक्तिमान का ही अंश है। ईश्वर हमारे अंदर भी मौजूद हैं, जरूरत है तो इसे अनुभव करने की।
हिंदुत्व हमें बताता है कि किसी भी व्यक्ति की प्रकृति या स्वभाव बुरा नहीं होता है। यदि वह स्वयं को नहीं समझ पाता है या उसके शरीर और मन-मस्तिष्क में सही तालमेल नहीं हो पाता है, तभी वह बुरे कर्म करता है। स्वयं को नहीं समझ पाने के कारण व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह आदि का शिकार होता है।
हिंदू मूर्ति की पूजा नहीं, बल्कि आदर्श की पूजा करते हैं। हालांकि हिंदू मानते हैं कि ईश्वर सभी जगह मौजूद हैं, इसलिए उनके आदर्श को मूर्ति (प्रतीकात्मक स्वरूप) में पूजतेहैं।
उत्सव की परंपरा का दूसरा नाम हिंदू है। ईश्वर अनंत हैं। इसलिए उन्हें धन्यवाद देने और उनकी कृपा को याद करने के अपरिमित कारण हैं। इसलिए हम बुराई पर अच्छाई की विजय (दशहरा), नेकी की जीत और अंधकार में भी ईश्वर की उपस्थिति का उत्सव (दीपावली) मनाते हैं। इसे हम केवल पर्व या त्योहार का नाम नहीं दे सकते। दरअसल, ये मौसम और जीवन चक्र में बदलाव के भी सूचक होते हैं। सबसे बडी बात यह है कि ये उत्सव हमें आज के समय में जीने की कला सिखाते हैं। हमारी प्रार्थनाएं, भजन, मंत्रोच्चारण सभी ईश्वर की महिमा और आशीर्वाद के साक्षी हैं, लेकिन इसका गहरा प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पडता है। इसलिए यह धर्म किसी जाति, राष्ट्र आदि की सीमा में नहीं बंधा है।

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