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मंगलवार, 22 जून 2010

जीवन की यात्रा

जब कभी हमें लंबा सफर करना पडता है, तब हम पहले ही सोच लेते हैं कि पहले, दूसरे और तीसरे दिन कितनी-कितनी दूर जाएंगे। अपने कुल सफर को हम कई मंजिलों में बांट देते हैं। जब एक मंजिल तय कर लेते हैं, तब दूसरे की तैयारी करते हैं। अगर एक मंजिल न जाएं, तो दूसरे की तैयारी की फिक्र नहीं रहती।

इसी प्रकार जीवन भी एक तैयारी है। रात को हम सोते हैं, तो इसलिए कि आराम करने से हम दूसरे रोज की मेहनत के लिए तैयार हो जाएं। नींद लेना केवल आराम करने के लिए है। परमेश्वर ने मनुष्य को ऐसा बनाया है कि उसके जीवन का एक भाग दूसरे भाग की तैयारी कर रहा होता है। जीने की सीख गोद के बच्चों को हाथ पकडकर खडा होना सिखलाया जाता है। धीरे-धीरे वह चलने लगता है। इसके बाद वह अपने आप खडा होने, चलने और दौडने लगता है। दो-तीन वर्ष के बच्चे अपने आप हाथ-पैर मारने लगते हैं, वे एक जगह स्थिर नहीं बैठ सकते हैं। उनका ऐसा स्वभाव भगवान ने उनके शरीर में बल बढाने के लिए बनाया है। यही बल आगे उनके काम आता है। छोटे बच्चों का स्वाभाविक खेल-कूद भी उन्हें जवानी के लिए तैयार करता है। उनके बोलने और सुनने की शक्ति उनमें आपसी सहानुभूति और प्रेम बढाती है। जब बच्चे बडे होते हैं, तो उन्हें स्कूल या पाठशाला भेजा जाता है। उन्हें अक्षर सिखाए जाते हैं, किताबें दी जाती हैं। उनसे कहा जाता है कि ठीक वक्त पर स्कूल जाना चाहिए। स्कूल में अलग-अलग प्रांतों के बच्चे पढते हैं। इनमें बंगाली, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय और पंजाबी बच्चे भी होते हैं, इनमें दोस्ती हो जाती है। उनमें से अधिकांश जीवनपर्यतमित्र बन जाते हैं।

शारीरिक व्यायाम के लिए प्रबंध रहता है, क्रिकेट, फुटबाल, हॉकीइत्यादि खेल होते हैं। नियमानुसार एक की हार होती है, दूसरे की जीत। प्रश्न उठता है कि पढाई और खेल क्यों होते हैं? जवाब है, क्योंकि ये आगे चलकर जीवन में काम आ सकें। जो लडके पढे-लिखेंगे, वे बडे होकर अपने कुटुंब का पालन कर सकेंगे, अपने देश की सेवा करने के योग्य बनेंगे। समय का महत्व खेल का महत्व इसलिए है, क्योंकि क‌र्त्तव्य पालन में कभी-कभी कुछ लोग उनके शत्रु बन सकते हैं। हारने पर दूसरे दल वालों से द्वेष व ईष्र्या और जीतने पर अभिमान और अहंकार न होने की उनसे उम्मीद की जाएगी। जो बच्चे सदैव समय पर पाठशाला जाएंगे, पाठशाला के नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगे, खेल के मैदान में न्याय से जीतने की चेष्टा करेंगे, वे बडे होकर संसार में संयमी बने रहेंगे। इस प्रकार पाठशाला के बालक आगे के लिए तैयार हो रहे हैं।

जब लोग जवान होते हैं, तब कमाने लगते हैं। सब लोग जानते हैं कि एक दिन वे बूढे हो जाएंगे, शरीर परिश्रम के योग्य नहीं होगा। इसलिए सबको इस बात की चिंता रहती है कि बुढापे के लिए कुछ कमाकर रख लें। जवानी बुढापे की तैयारी है। परमात्मा ने मनुष्य को जितना जीवन प्रदान किया है, उतना ही उसे चलाने के लिए आंख, नाक, कान जैसी ज्ञानेंद्रियोंका साजो-सामान भी दिया है। यदि सामान कम हो जाए, तो हमारी ही असावधानी है, उसका दोष नहीं। यदि बुढापे में हम उठ-बैठ न सकें, किसी को देख न सकें या बात न सुन सकें , तो निश्चित रूप से हमारे जवानी के दिन निष्प्रयोजन बीत गए। इस प्रकार बचपन लडकपन की तैयारी है। लडकपन जवानी की, जवानी बुढापे की और बुढापा एक ऐसे जीवन की तैयारी है, जिसे हम नहीं जानते। पर एक बात तो तय है कि हमारी आने वाली पीढियां उसी रास्ते पर चलेंगी, जिस पर हम चलते आए हैं।

जीवन संसार यात्रा की तैयारी है। यदि इसके महत्व को हम समझ जाएं, तो हममें आत्म-मर्यादा, परिश्रम, संतोष और आशा उत्पन्न हो जाए। हमारा जीवन संसार के उपकार का कारण बने।


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